नीयत साफ हो तो सब अच्छा हो सकता है.. बस एक बार मौका दे दो…. उत्तराखंड की तस्वीर बदल देंगे.. अरविन्द केजरीवाल

उत्तराखंड खबर की खबर चुनावी चहल पहल

 

दिल्ली के मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविन्द केजरीवाल एक बार फिर अपनी पार्टी के प्रचार को धार देने उत्तराखंड में हैं। उन्होंने कहा कि अगर सरकारों की नीयत ठीक हो तो सब कुछ अच्छा हो सकता है। उत्तराखंड का हर नवजात अपने ऊपर 50 हजार से ऊपर का कर्ज लेकर दुनिया में आता है। आखिर जब यहाँ के नेता पाँच साल में लखपति से करोड़ोंपति बन जाते हैं तो ऐसी परिस्थितियाँ  क्यों पैदा हुयी कि  जनता त्रस्त  है? प्रदेश में पार्टी के मुख्यमंत्री उम्मीदवार कर्नल कोठियाल ने कहा कि रोजगार बढ़ाने  और पलायन रोकने  के बारे में कांग्रेस और भाजपा की कहीं कोई सोच ही नहीं है।  रोजगार के सभी साधनों पर या तो राजनेताओं और उनके परिवार जनों  या फिर उनके संबंधियों का कब्जा है फिर चाहे वो सरकारी नौकरियां हों,संविदा पर दी गई नौकरियां हों या फिर खनन और पर्यटन जैसे बड़े क्षेत्र का मामला हो इन सभी पर पर सिर्फ  चंद प्रभावशाली लोगों का आधिपत्य  है और हमें इसे रोकना है जिसे सिर्फ आम आदमी पार्टी कर सकती है। खनन और पर्यटन दोनों उत्तराखंड में रोजगार के बड़े साधन बन सकते हैं मगर इसके लिए कोई ईमानदार नीति नहीं है । कर्नल कोठियाल ने कहा कि भूतपूर्व फौजी हो या अर्धसैनिक सभी अनुशासन और अनुभव के खजाने होते हैं मगर अभी तक प्रदेश में इन्हे सुरक्षा गार्ड से बड़ी नौकरी नहीं मिलती और इसके लिए भी उन्हें जगह जगह दरवाजे खटखटाने पड़ते हैं आम आदमी पार्टी की सरकार बनते ही इन्हे इनके हुनर और अनुभव के आधार पर सम्मानजनक नौकरी दी जाएगी। महिला सशक्तीकरण के लिए दुनिया में सबसे बड़ी योजना हमने उत्तराखंड की महिलाओं के लिए बनायी है जिसमें हर महिला को प्रतिमाह एक हजार रुपये मातृ शक्ति सम्मान के रूप में दी जाएगी। पहले साल एक लाख रोजगार और हर बेरोजगार को हर महीने पाँच हजार बेरोजगारी भत्ता देने का वादा करती आम आदमी पार्टी के बारे में  बहरहाल हकीकत यह है कि इतने बड़े लोक लुभावने वादे करने के बाद भी आम लोगों में इन वादों का विश्वास जम नहीं पा रहा है। जो भरोसा दिल्ली की जनता आम आदमी पार्टी पर लगातार बढ़ाती जा रही है उसे जमाने में उत्तराखंड में अभी तक आम आदमी पार्टी को बड़ी सफलता नहीं मिल पा रही है। शायद लगता है कि उत्तराखंड के लोगों ने राजनीतिक पार्टियों से नाउम्मीद होकर जब  उनके वादों को सुनना ही बंद कर दिया है तो समझने का तो सवाल ही नहीं होता। और इसी का खामियाजा आम आदमी पार्टी को भी भुगतान पड़ सकता है।

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