कोरोना से निपटने के बाद क्या करेगी सरकार…

आज प्रधानमंत्री मोदी का एक पुराना इंटरव्यू देख रहा था,जिसमे प्राइवेट सेक्टर और पब्लिक सेक्टर के बारे में चर्चा करते हुए वो कहते हैं कि सरकार का काम व्यापार करना नहीं है,पब्लिक सेक्टर तो मरने के लिए ही होते हैं. व्यापार का मतलब सीधे सीधे आर्थिक लाभ उठाना ही तो होता है मार्च से पहले तक देश दुनिया में जैसी परिस्थितियां थी तो तब सरकार शायद इसी सोच से काम भी कर रही थी, पब्लिक सेक्टर पर बाजारीकरण का बड़ा भारी दवाब डाला गया. इनसे उम्मीद यही की गयी कि ये अपनी कार्य प्रणाली कारोबारी फायदा उठाने के लिए बदले , इसका असर ये हुआ कि इन कंपनियों के कर्मचारी अपनी नौकरियों की सुरक्षा के प्रति आशंकित हो गए.इसी दौर में इंडियन रेलवे में निजीकरण की तो शुरुआत हो चुकी है, हाई वे बनाने और चलाने का काम भी प्राइवेट कंपनियों के ही हाथों में है,एयर इंडिया, ओ एन जी सी,इंडियन आयल,जैसी कई बड़ी बड़ी सार्वजनिक सेक्टर की कंपनियों में सरकार की हिस्सेदारी समाप्त करने या फिर कम करने की शुरुआत भी हो चुकी , मगर आज कोरोना वायरस संकट ने पूरी दुनिया के सामने एक बड़ा प्रश्नचिह्न पैदा कर दिया है. लॉक डाउन ने देश में सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की लचर व्यवस्थाओं के बावजूद इसकी सारी व्यवस्थाएं निजी क्षेत्र की जगह सरकार के हाथ में लानी पडी हैं,लॉक डाउन के कारण बंद हुए उद्द्योगों में काम कर रहे मजदूरों की जिम्मेदारी सरकार को ही उठानी पड़ रही है, क्योंकि सरकार का काम निजी क्षेत्र की तरह लाभ कमाने का व्यापार करना नहीं होता. पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के पोषक अमेरिका,ब्रिटैन,स्पेन.फ्रांस जैसे देशों में आज की स्थिति में स्वास्थ्य, ट्रांसपोर्ट जैसी सेवाओं का राष्ट्रीयकरण होने जा रहा है. यूरोप में तो कुछ देशों में मजदूरी या श्रमिक लोगों को सरकार काम पर ना जाने के लिए पैसे दे रही हैं. ये नया बदलाव दुनिया में कोरोना की वजह से आ रहा है. सरकारों को अपनी जनता के भरण पोषण और स्वास्थ्य की जिम्मेदारियां अपने ऊपर ही लेनी पड़ रही हैं. भले ही ये एकमात्र और परमानेंट उपाय नहीं है मगर सरकारों को अपनी कार्यप्रणाली तो बदलनी पड़ ही रही है जिसके बारे में कुछ दिनों पहले सोचा भी नहीं जा सकता था. हकीकत तो यही है कि कोरोना वायरस ने हमारे वर्त्तमान सिस्टम की कमियां तो पूरी तरह से उजागर कर दी हैं. अब सरकार को अपनी नीतियों के बारे में पुनर्विचार और मंथन तो करना ही पड़ेगा. उम्मीद है सरकार के साथ हमारी जनता भी इस दौर के बाद सामजिक बदलाव के लिए तैयार रहेगी..

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